ज़िंदगी

आहिस्ता चल ज़िंदगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है,
कुछ दर्द मिटाना बाकी है, कुछ फ़र्ज़ निभाना बाकी है I

रफ़्तार में तेरे चलने से कुछ रूठ गये, कुछ छूट गये,
रूठों को मानना बाकी है, रोतों को हसाना बाकी है I

कुछ हसरातें अभी अधूरी हैं, कुछ काम भी और ज़रूरी है,
ख्वाहिशें जो घुट गयी इस दिल में, उनको दफ़नाना बाकी है I

कुछ रिश्ते बन कर टूट गये, कुछ जुड़ते-जुड़ते छूट गये,
उन टूटे छूटे रिश्तों के ज़ख़्मों को मिटाना बाकी है I

तू आगे चल मैं आता हूँ, क्या छोड़ तुझे जी पाऊँगा?
इन साँसों पर हक़्क़ है जिनका, उनको समझाना बाकी है I

आहिस्ता चल ज़िंदगी, अभी कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है II

(I received this poem from a friend Jagjit Singh Sidhoo written in Roman English, which I transliterated in hindi. Shiv Rana)

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About Shiv Rana

A veteran of the Indian Army.
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