बुढ़ापे की दहलीज़ में

This was written in the hills of Kinnaur (district – Rekang Peo in Himachal Pradesh) on 23 April 1993… Shiv Rana

पढ़ा और सुना कि . ….

बुढ़ापा एक अभिशाप है,
किंतु अभी तो इस जवानी की
ढलती शाम पर और बुढ़ापे की दहलीज़ पर
जब में खड़ा हूँ,
तो मुझे अच्छा लगता है.

मुझे बुढ़ापे से आशाएँ हैं, कि
मैं अपने जीवन के इस भाग को
अपने जवानी के सारांश से
आगे अगली पीढ़ी के जवानों को
कुच्छ बता पाऊँगा,
समाज को, देश को कुछ दे पाऊँगा.

किंतु अभी तो इस जवानी की
ढलती शाम पर और बुढ़ापे की
दहलीज़ पर जब में खड़ा हूँ,
तो मुझे अच्छा लगता है.

इसने मुझे समय दिया है कि
में अपने पित्रित्व को दिखा सकूँ.
अपने अस्तित्वा को समझ सकूँ.
अपने आप को अपने से उपर उठा सकूँ.

किंतु अभी तो इस जवानी की
ढलती शाम पर और बुढ़ापे की
दहलीज़ पर जब में खड़ा हूँ,
तो मुझे अच्छा लगता है.//

by शिव ओम राणा

About Shiv Rana

Retirement life is series of transition: from Olive Green to civvies, being woken up a buddy to fetching morning milk from the milk booth. And now trying to adjust with new-normal due to pandemic - CORONA.
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